Saturday, August 7, 2010

हिंद-स्वराज

हिंद-स्वराज

स्वतंत्रता दिवस के अवसर पर exam की मारा-मारी के बाबजूद मन बात करने से अपने आपको रोक नहीं पा रहा है | अभी गत दिनों 'सबल भारत' के कार्यक्रमों में सक्रिय भागीदारी के दौरान मेरी मुलाकात श्री अशोक जी से हुई | उन्होंने मुझे गाँधी जी की पुस्तक 'हिंद-स्वराज' पढने के लिए कहा |


विचारणीय तथ्य यह है की इस पुस्तक के पढने से पहले बापू के प्रति में ज्यादा समर्पित भावना नहीं रखता था और देश की विभाजन और अन्य तथ्यों के लिए उन्हें जिम्मेद्दार मानता था | ऐसा होना  स्वाभाविक भी था क्योंकि  ये सरे विचार सुनी-सुनाई बैटन पर आधारित थी |

नसीब की बात थी की श्री अशोक जी से वार्ता-लाप के कुछ दिनों बाद दिल्ली पब्लिक पुस्तकालय में उक्त पुस्तक, जो की बिलकुल नई-२ आई थी, मुझे मिली | ७८ पेजों की यह पुस्तक बापू ने १९०१ में लिखी थी और वो भारत का कैसा स्वराज चाहते थे यह एक बड़े ही अनोखे अंदाज में बताया था | पुस्तक पढने से पहली बार में बापू के वास्तविक सोच से अवगत हुआ और मैंने अपने-आप में बापू के प्रति  अपने पूर्व-विचारों के लिए ग्लानी महसूस की |

आखिर क्या था इस पुस्तक में !

पुस्तक में था एक दूरदर्शी सोच, जो की हमारे आज के नेतृत्व में बिलकुल नहीं है | और जब में आज को देखता हूँ तो मुझे एहसास होता है वो कितने सही थे | सबसे पहले उन्होंने अंग्रेजों को नहीं उनकी सभ्यता को खतरनाक बताया और साफ-साफ उन्होंने लिखा की अंग्रेजी सभ्यता किस हद तक खतरनाक है | उन्होंने कहा की " हमें कोई आपत्ति  नहीं है, आप हम पर बेशक  राज करें लेकिन आपको हिन्दुस्तानी सभ्यता में अपने आपको ढालना होगा , आपको राज हमारे हिसाब से करना होगा"| वहीँ दूसरी और उन्होंने जनता से इस अंग्रेजी सभ्यता के बुराइयों से बचने को कहा और कहा हमारी पारंपरिक सभ्यता ही मानव-कल्याण का  एकमात्र और अंतिम उपाय है |

आधुनिक-शिक्षा पर कटाक्ष करते हुए उन्होंने इसे सिर्फ अक्षर ज्ञान कहा और का यह सिर्फ गुलामी की तरफ ले जाने का साधन है | इसी तरह उन्होंने अंग्रेजी चिकत्सा पद्धति, वकालत, रेल, ब्रिटिश संसद हरेक की निंदा की | और जब में आज के सन्दर्भ में अपनी देश के शिक्षा-व्यवस्था, globlisation , MNCs कंपनियों, विज्ञान के आधुनिक प्रयोग, हमारी संसद की ओर देखता हूँ तो बस यह मुह से निकलता है बापू तुम कितने सही थे |

सबसे बड़ा प्रश्न यह है की बापू के नाम पर गद्दी सभालने वालों ने उनकी सोच का किस-तरह गला घोटा, उस पर उँगलियाँ उठाने के लिए कोई नहीं आया और आज हम उस जगह पहुँच गए जहाँ से अभिमन्यु की तरह निकलने का कई रास्ता नहीं दिखा रहा है |

सबसे पहला प्रश्न यह है की क्या हम स्वराज का मतलब समझते हैं ? क्या हम १९४७ में वाकई में आजाद हुए या सिर्फ वो सत्ता का हस्तांतरण था? हमारा भविष्य क्या है? क्या हम वाकई आजाद हैं अपने निर्णय के लिए? क्या हम सिर्फ एक मशीन बनकर रह गए हैं ? क्या हमारी आने पीढ़ी हमारी इस उदासीनता के लिए हमें क्षमा करेगी ? क्या 'हिंद-स्वराज' हमारे पाठ्यक्रम का हिस्सा नहीं होना चाहिए था? इन सारे प्रश्नों पर विचार जरुरी हैं | और आप सभी से आग्रह करता हूँ की हिंद-स्वराज की इस पुस्तक को स्वंत्रता-दिवस के अवसर पर जरुर पढ़ें और इक नये डगर को बनाने की लिए चले, जो की हमें परंपरा और संस्कृति से जोड़ता है और हमें गर्वान्वित करता है|

जय हिंद

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